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Showing posts from September, 2026

एक दावत

 कल शाम की दावत के बाद  मांस का एक टुकड़ा  ऊपर के लगे जबड़े से लटकती पिछली दाँत के बीच में जा फसा है। वापस घर आते वक्त वो पूरे रस्ते मेरे जीभ से आंख मिचौली खेलता रहा है मै अपने अथक प्रयास के बावजूद  उसे अपने दांतों से निकाल नहीं पाई हूं रास्ते भर के चले इस मसक्कत में मेरा  जबड़ा अब दुखने लगा है और  अब बस मै सो जाना ही उचित समझती हूं। सुबह उठते ही बिना किसी सोच विचार के  मेरी जीभ दांतों के किनारों का मुआयना  करने निकल जाती है  और पूरे दिन का कार्यक्रम खुद बख़ूद  ही तय हो जाता है। टुकड़े को निकाल फेंकने का  मिशन इंपॉसिबल शुरू हो चुका है अपनी व्यवहार रूपी आलस्य की  खूबियों से भरपूर मैं  खुली आंखों से स्वप्न में खो जाती हूं जिसमें मैं देखती हूं  अपने विशाल काय दांत  और उसे निहारती मेरी आँखें  मेरी आँखें देखती है कि  मांस का टुकड़ा एक पत्थर नुमा आकृति  ले चुका है और वो मेरी दांतों के बीच  अपनी जड़ें मजबूत कर के बैठा है मेरे दोनों हाथ उस चट्टान को बाहर निकालने  में जुटे हुए हैं थोड़ी कोशिश के बाद...