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टपकता खून

तुम्हारे पर्दे से टपकता खून  कभी तुम्हारा फर्श गंदा नहीं करता वो किनारे से लग के  बूंद बूंद रिसता है  मुझे मालूम है कि  हर गुनाहगार की तरह  तुम्हे, तुम्हारे गुनाह मालूम है पर तुम्हारा जिल्ल ए इलाही बन  सबकुछ रौंद जाना  दरवाजे पर लटके पर्दे पर  और खून उड़ेल देता है।

बेफिक्र

मेरे सपनों में तुम्हारा कोई रंग नहीं है तुम्हारे जैसी एक छाया है  जो  हू ब हू तुम्हारे जैसा है  सुबह की किरण कभी  मेरे सपने में पहुंची ही नहीं तुम्हें तौलने की बात ही  सिरे से ख़ारिज हो चुकी है तुम सपने में ही सही बेफिक्र घुमा करो। 

कितना जरूरी है

कितना जरूरी है मेरा सुंदर दिखना  और तुम्हारा पैसा कमाना? कितना जरूरी है मेरा बेदाग दिखना  और तुम्हारा पैसा कमाना? कितना जरूरी है मेरा सुशील होना और तुम्हारा पैसा कमाना? कितना जरूरी है मेरा पढ़ा लिखा होना  और तुम्हारा पैसा कमाना? कितना जरूरी है मेरा पर्दे में होना  और तुम्हारा पैसा कमाना? कितना जरूरी है मेरा पूछ के घर से निकलना  और तुम्हारा पैसा कमाना? कितना जरूरी है मेरा खाना बनाना  और तुम्हारा पैसा कमाना? कितना जरूरी है मेरा मेहमानों को देखना  और तुम्हारा पैसा कमाना? कितना जरूरी है मेरा नौकरी छोड़ बच्चों को देखना  और तुम्हारा पैसा कमाना? कितना जरूरी है मेरा तुम्हारे लिए व्रत रखना  और तुम्हारा पैसा कमाना? कितना जरूरी है मेरा बीमार होके तुम्हे 10  बार डॉक्टर के पास ले जाने के लिए कहना  और तुम्हारा पैसा कमाना? कितना जरूरी है.....

हल्का प्रेम

कितना हल्का है तुम्हारा प्रेम  जो समाज के थपेड़ों से डरता है मैंने देखा है तुम्हे  मुझे छुप कर के देखते हुए मेरे पलट कर देखने के बाद भी  तुम अपनी निगाह हटाया नहीं करते थे कम्युफ्लेज कर रहे थे तुम तो  कितना हल्का है तुम्हारा प्रेम.... रोज रात को दीवानों की तरह गाने  सुनाया करते थे मुझे  याद है वो बारिश की रात  जब तुम घर तक आ पहुंचे थे सिर्फ इसलिए कि तुम मुझे बारिश में देखना चाहते थे। उसकी अगली सुबह तुम्हारे पापा ने मेरे पापा को नौकरी से निकाल दिया था। शायद यह भी याद होगा तुम्हे  कितना हल्का है तुम्हारा प्रेम.... हाई स्कूल के पीछे पेड़ के नीचे बैठ के  बूढ़े होने का वादा कर गए थे तुम  और आज देखो  सच में तुम्हारी बूढ़ी आँखें काम नहीं कर रही तुम किसी और के साथ बूढ़े हो चुकने का फिर से  वादा कर आए हो कितना हल्का है तुम्हारा प्रेम... तुम शुरू से जानते थे  हमारे बीच का फर्क  पर कभी अहसास नहीं होने दिया  आज तुम ऊंचे हो कद में थोड़े  तो अब मेरा कद छोटा लग रहा है  तुमने रात में आना बंद कर दिया है बारिश में भीगना ब...

गुलदस्ता वाला चेहरा

शायद वो भूल गया है मुझे  3 हफ्ते हो गए और मेरी कोई  खबर नहीं। क्यों जरूरी हूं मैं उसके लिए  उसके जिंदगी में बहारों की  क्या कमी है? मोबाइल की नोटिफिकेशन  निहारती मै, उसके मेसेजेज का वेट करती मै, कितनी अजीब लगती हूं। खुद से बातें करके मैने  घर के कोने में एक  बड़ा सा ऊन का गट्ठर तैयार कर लिया है रोज उस गट्ठर को सुबह-शाम देखती हूं दोपहर को उसके कंधे पर सोती हूं और  शाम ढले उसके बाहों से सरक कर फिर से जमीन पर आ लगती हूं। जब गट्ठर से जी भर जाए तो  फिर से मोबाइल का नोटिफिकेशन  निहार लेती हूं  और फिर से वही निराशा। कितनी दयनीय हो गई हूं मैं! कल सुबह उठ के मैने यही सोचा  की मैं आज उस ऊन के गट्ठर को  खिड़की से बाहर फेक दूंगी और उस जगह पर खुद को सजाऊंगी और आज जब खिड़की खोली तो  वो अपने गुलदस्ते वाले चेहरे के साथ खड़ा था।

कचरे का ढेर

                                              शिवानी  मैं कचरे के ढेर में रहती हूं और इस ढेर में रहते हुए  खुद को दूसरों से अलग दिखाने की  पुरजोर कोशिश करती रहती हूं पूरी जिंदगी। निम्न अस्तर के कचरे में रहने वाले  लोगों से मुझे एक अजीब सी 'बु' आती है मैं जब उनकी गली से गुजरती हूं  तो नाक पर हाथ का चले जाना  बहुत आम प्रक्रिया होती है। 'बु' वाले घर से मेरे घर एक लड़की काम  करने आती है। मैं अपनी कुर्सी पे बैठी होती हूं और वो सामने बने सीढ़ियों पे बैठती है। मुझे नहीं पता उसके घर के खाने का स्वाद पर वो जानती है मेरे घर क्या पकता है मैने कभी उसका चूल्हा नहीं देखा  पर वो रोज मेरा बर्तन साफ कर के ही घर जाती है। पूजा के समय वो पीतल के बर्तन नहीं धुलती पर अम्मा को जब पूजा करते करते कमर में  तेज दर्द होता है तो  वो पूरे बदन की मालिश जरूर करती है। अम्मा ने बक्से से एक चमकीली साड़ी  निकाली है। और वो साड़ी अब उन्हें नई लग रही सो उन्ह...

आईना

दीवार पर टंगा आईना  क्या तुम्हे देखता है?  या, तुम उसे निहारती हो क्या देखती हो आईने में? खुद को या, उन नज़रों को जो तुम्हे देखते है। क्या ढूंढती हो आईने में? अभी का सच  या, कुछ देर में आने वाली बहार। क्या तलाशती हो आईने में? खुद को या, पीछे छूट चुके पल को। माथे की बिंदी जो तुम  आईने पर टाक जाती हो उसमे कोई अपना चेहरा  निहार जाता है। अपने चेहरे को बिंदी की जगह रख कर खुद को सजा जाता है। तुम क्या झंझोरती हो आईने से  उसे, या, उसके देखे रूप को। बिस्तर के एक कोने में बैठा शख्स  तुम्हे आईने से दूसरे कोने में तलाशता है दूसरे कोने में बैठी तुम  आईने से क्या पूछती हो? उसकी नज़रों का सच  या, उसके पीछे की उधेड़बुन  जो शायद टूट कर बिखर जाना चाहता है।

सर्दी की सुबह

मैं उनसे पहली बार  सर्दी की एक खुबसूरत  सुबह मिली थी। सफेद शॉल में लिपटे उनके  बदन ने मुझे देखा था  उनका मुझे देखना और  यह देख के शर्मा जाना  की वो मुझे देख रहे है  लाजमी था।  ठंड की अकेली दोपहर हमने  साथ गुजारी थी बिना एक दूसरे से बात किए  बीच बीच में बस कुछ  छोटी छोटी बातें हुई थी जैसे शहर कैसा है? मौसम कैसा है? यह कंबल सही है की नहीं? खाना खाओगी?  बस इतनी ही बातें थी हमारी अगली सुबह मेरा आखिरी दिन था उनके साथ सोमवार का दिन  और मैं जा रही थी सोमवार को भी कोई जाता है भला? सोमवार को दुनिया जहान के काम होते है कोई कैसे बैठेगा मेरे सामने  पर मैं उसी दिन जाने वाली थी सुबह सुबह पहली बार मैंने उन्हें  तैयार होते हुए देखा था  बहुत सुंदर लग रहे थे वो  मैं एक बार उनकी आंखों में  देखना चाहती थी मैं उनकी तरफ देखती रही पर उन्होंने मुड़ के मुझे नहीं देखा।

अलग रास्ते

अंजान था सफर जब मैं  तुमसे पहली बार मिला ऐसा नहीं था की इससे पहले दोस्त नहीं बने मेरे  या तुम पहले इंसान थे। लोग बहुत रहे मेरे जिंदगी में  पर तुम उसमे सबसे नायाब रहे एक वक्त के साथी का छूट जाना मुश्किल है उससे भी मुश्किल है उसके बिना सफर तय करना यह नहीं है की मैं खड़ा नहीं हो पाऊंगा नाही मैं कोने में बैठ सिसकियां बटोरूंगा पर तुम्हारा होना मेरी खुशी हुआ करती थी आज जो तुम नहीं हो तो  यह कमरा सुना लगता है अंधेरे से कमरे में एक  बुत बना सा लगता है भरी सड़क है  फिर भी शांत सा लगता है दरवाजे पर खड़ा एक लड़का अपने दोस्त को जाते देखता है।

सितमगर

                                        📷(अनन्या)  मैं अपने सितमगर से कहती हूं उसके सितम का हाल  मुझे लगता है वो अंधेरे  में खड़ा निशानें लगा रहा है वह नहीं जानता वह क्या कर रहा है मैं अपने सितमगर से कहती हूं  उसके सितम का हाल मुझे लगता है वो  अनजाने में मुझे कर्कस कह गया दिल तो बड़ा साफ है उसका मुझे लगता है वो थक चुका है  मुझे उसके पास होना चाहिए  मैं जब भी उसके करीब जाती  वो हाथ बढ़ा छिटक देता है  मैं अपने सितमगर से कहती हूं.... वो शाम को टीले पर बैठ कर  धुवां हवा में उड़ाता है यह देख मैं चौक जाती हूं मैं सोचती हूं  जरूर कोई गंभीर समस्या है वरना कोई जहर जान बूझ कर पीता है भला? मैं उसे डब्बे के पीछे की तस्वीर दिखाती हूं वो मुझे टुकूर टुकूर ताकता है  और धुवां मेरे मुंह पर उड़ा देता है मैं अपने सितमगर से कहती हूं...... पता नहीं क्या बात रही होगी  जो कल तक का भला चंगा इंसान मेरे शरीर पर दाग दे जाता है जादू टोटका किया होगा किस...

साधारण

कितना साधारण है रोज मर्रा की जिंदगी में  मौत की खबरें देखना और सुनना। कितना साधारण है दिन दहाड़े चोरी  की खबरें पढ़ना। कितना साधारण है पानी में बढ़ते आर्सेनिक  की मात्रा को नजरअंदाज करना। कितना साधारण है हर साल  बारिश के महीने में पुलों का धराशाई हो जाना। कितना साधारण है बाढ़ में  लोगों से उनका बसेरा छीन जाना। कितना साधारण है गर्मी के दिनों में पानी की किल्लत सहना। कितना साधारण है खुली हवा में सांस ना लेना। कितना साधारण है रोड पे कूड़े का अंबार होना। कितना साधारण है महंगाई का आसमान छूना। कितना साधारण है परीक्षाओं में अनियमितता  अगर कुछ असाधारण है तो वो है संप्रदाइक दंगे  और उस से उपजा साधारण लोगों की जाती जानें। असाधारण है अंतर्जातीय विवाह  पर साधारण है उसके अग्नि से निकले  अपने आपको बचाती लपटे।  असाधारण है विदेशों में घटने वाले किस्से  और साधारण है अपने ही घर को सुलगता हुआ देखना। 

फोन का दूसरा कोना

                                                               Image courtesy Ananya        तुमसे बात करते वक्त  अक्सर मैं खुद से बात करने लगती हूं। फोन के उस तरफ पड़े तुम अपनी अनगिनत बातों का पिटारा खोले बैठे होते हो और फोन के दूसरी तरफ मैं तुम्हारे दिखाए  पिटारे से दूर जाके  खुद को खुद से गुफ्तगू करते हुऐ पाती हूं। तुम बीते कल के कुएं से  यादों को बाल्टी में भर के खींच रहे होते हो और मैं आने वाले कल के समंदर में  गोते लगाने के लिए तैयार बैठती हूं। बीते 20 साल चंद घंटों में समेटना  बिल्कुल ऐसा है जैसे  भरी बाल्टी में पानी भरना। तुम्हारी बाते बाल्टी में  भरते-भरते ऊपर तक आ जाती है और उसके बाद मैं बह जाती हूं  खुद की बातों के साथ  तुम्हे फोन के दूसरे तरफ  छोड़ के।

खुद की बात

6 महीने पहले मिली थी मैं तुमसे तुम्हे याद है कितनी बातें हुई थी हमारी? अपने बचपन के बारे में स्कूल के बारे में टीचर्स की खिंचाई  और जो हमने नींबू वाले बगीचे  के बाहर खड़े हो के नींबू चुराई थी तालाब में गोते लगाने के बारे में और हां, जब तुमने A, B, C, D पूरी  याद की थी और A for Apple  B for Ball पूरे क्लास में सुनाया था कितनी खुश थी तुम  तुम अकेली जो थी उस क्लास में  सुनाने वाली। जब तुम्हारी दीदी की शादी तय हुई  तुम सातवे आसमान पे थी  तैयारियों को लेकर कपड़ो को लेकर नए जीजा जी के स्वागत को लेके भी तुमने कितने सपने देखे थे तुम थाली कैसे सजाओगी  आरती में कितने पैसे मांगोगी और कैसे उन्हें चुपके से  रसगुल्ले की बजाए  आलू खिलाने का इरादा था तुम्हारा इन सबों के बीच तुम्हारी भी शादी की  खबर आना थोड़ा चौका गया था मुझे शायद तुम्हारे लिए भी  ये कुछ ऐसा ही अनुभव रहा होगा मैं अब तुमसे शादी के बाद मिली हूं तुम अब भी दुनिया भर की बातें करती हो अपने नए जीवन साथी के बारे में अपने नए घर के बारे में  तोहफे में मिले गहनों और कपड़ों के बा...

उधेड़ बुन

बहुत अंधेरे में रहा है वो दिन के उजाले में  ढूंढता है खुद को  रात, थक के सो जाता है। एक उधेड़ बुन सी जिंदगी है उसकी  अपनी खुशियां दरारों में भर के  फर्श सजाया करता है। तपती धूप में चला है वो बिना छांव की तलाश में थक के पेड़ की ओट में  बैठ के, ठंडी हवा की चाह  रखता है तो वो क्या गलत चाहता है!

8 बजे

हर शाम की आखिरी मुलाकात  को 8 बजे के आखिरी सेकंड से  चुरा के अपने बस्ते में  छुपा लाई हूं। वो वक्त वही रुका है,  उस रास्ते पे शाम ढलेगी  सुबह का सूरज निकलेगा लोगों के जमावड़े होंगे अनवरत बातों का सिलसिला होगा  पर अब घड़ी के सूई  8 तक नहीं पहुंचेगी। 

वादा

तुम्हारी सारी यादें समेट  के रखने का वादा करती हूं  ठीक उस तरह जिस तरह नए घर में हर एक जगह  सामान सजा के रखा जाता है  तुम्हारे होने को सजा के  रखने का वादा करती हूं अपने अलमारी में रखे कपड़ों  की तह की तरह रसोई में रखे रंग बिरंगे डिब्बों की तरह पूजा घर में रखे दिया की तरह कमरे से आती खुशबू की तरह किताबों से आती भीनी सुगंध की तरह आम के पेड़ पे लगे मोजर की तरह

घर

                              ( @chitransh_12 _) परिक्षा देते वक्त ये सीखा  की एक पड़ाव पार करने के बाद जिंदगी सेट हो जाती है।  चार दिवारी से बाहर  निकला तो पूरी जिंदगी वीरान दिखी। जिंदगी सेट करने के  लिए मैं ऐसे भागा,  की खुद को आज   आईने में देखता हूं तो बचपन कोने में बिखरा  मिलता है। और जवानी धूप में तप के खाक हो चुकी होती है। धुंधली नजरों से सपने भी अब धुंधले दिखने लगे है उस सपने में मुझे मेरा  घर दिखता है जिसे बनाने मैं निकला तो हूं पर कभी पहुंच पाऊंगा ये  कहना मुश्किल है। 

तुम हो ना

                                (@nikumbh1001) सुबह उठ के खुद के सिरहाने  निहारना अब अच्छा लगने लगा है। तुम्हारे बालों की भीनी खुशबू  और आसमान से सूरज का झांकना मसाले चाय की तरह काम  करती है।  ये सब कुछ है, क्योंकि तुम हो। तुम हो ना? जिंदगी की बहुत सारी उलझनें पीछे छोड़ आया हूं या, यूं कहूं की  तुम्हारे आने से उलझनें अब  उलझन नहीं लगती ऐसा है, क्योंकि तुम हो। तुम हो ना? मेरे अंदर एक कौतूहल हुआ करता था।  एक ऐसा द्वंद जो मुझे  मुझसे दूर लेजाके ना जाने किस कोने में  फेक चुका था।  तुम्हारा आना मेरे कौतूहल  से बाहर आना है। क्योंकि तुम हो। तुम हो ना? एक अंधेरी शाम गुजारी है मैने खुद के बिना। अच्छा, ठीक है  ना जाने कितनी शामें गुजारी है खुद के बिना।  पर अब, जब तुम हो तो खुद का साथ अच्छा लगता है। तुम हो ना?

अपने से सपने

तुम्हारा प्यार में होना  तुम्हारा प्यार में होना अच्छा है पर तुम्हारे प्यार में तुम्हारा  गुम हो जाना मुझे डरा जाता है। मैंने ये नहीं कहा की  तुम गुलाबों की पंखुड़ियों पर उसके नाम ना लिखो। लिखो, बेशक लिखो  पर ध्यान से,  उसके नीचे के काटें तुम्हे चुभे ना। मैंने ये नहीं कहा की  उसके इंतजार में ना बैठो, बैठो, बेशक बैठो पर अपने आप को साथ लेके बैठना। मुझे याद है तुमने कहा था वो तुम्हारे लिए  फूलों का गुलिस्ता बनाता है। हां, ये भी याद है की  तुम्हारे कहने पे वो  कॉलेज के सिक्योरिटी गार्ड को  चकमा देके तुम्हारे लिए गुलाब के फूल लाया था। और, यह भी याद है की उसने कहा था की, अभी जैसा चल रहा है  चलने देते है। मुझे ये बात डरा जाती है। क्युकी तुम यहां खड़ी होके उसके सपने में बूढ़ी हो चुकी हो। उसके आंगन में सुबह का सूरज हो चुकी हो। उसके रात में आसमान पर टंगा चांद हो चुकी हो। तुम उसके सपने में बूढ़ी हो चुकी हो।  हर गली हर गली से तन्हा निकली हूं, हर महफ़िल के बाद वो आए मेरे आंसू सूखने के बाद। वो कहते थे तुम्हारा होना मेरा होना है वो छोड़ गए बस...

पर्दा

मेरे और तुम्हारे होने के बीच  एक पर्दा है। पर्दे के इस तरफ  एक विरान गली, और पर्दे के उस तरफ  फूलों से सजा बाग। पर्दे के इस तरफ  एक सच्चाई है जिसे गले से नीचे  उतार पाना बड़ा मुश्किल है। और पर्दे के उस तरफ एक बहती नदी की नाव में सवार हम बस चले जा रहे है दूर बहुत दूर। इस तरफ की जिंदगी में  तुम मुझसे भागते हो। और उस तरफ आगे  बढ़ के हाथ मेरा थामते हो। चलो आज ये पर्दा हटा दे स्वप्न मिटा दें।