Skip to main content

एक दावत

 कल शाम की दावत के बाद 
मांस का एक टुकड़ा 
ऊपर के लगे जबड़े से लटकती
पिछली दाँत के बीच में जा फसा है।
वापस घर आते वक्त वो पूरे रस्ते
मेरे जीभ से आंख मिचौली खेलता रहा है
मै अपने अथक प्रयास के बावजूद 
उसे अपने दांतों से निकाल नहीं पाई हूं
रास्ते भर के चले इस मसक्कत में मेरा 
जबड़ा अब दुखने लगा है और 
अब बस मै सो जाना ही उचित समझती हूं।
सुबह उठते ही बिना किसी सोच विचार के 
मेरी जीभ दांतों के किनारों का मुआयना 
करने निकल जाती है 
और पूरे दिन का कार्यक्रम खुद बख़ूद 
ही तय हो जाता है।
टुकड़े को निकाल फेंकने का 
मिशन इंपॉसिबल शुरू हो चुका है
अपनी व्यवहार रूपी आलस्य की 
खूबियों से भरपूर मैं 
खुली आंखों से स्वप्न में खो जाती हूं
जिसमें मैं देखती हूं 
अपने विशाल काय दांत 
और उसे निहारती मेरी आँखें 
मेरी आँखें देखती है कि 
मांस का टुकड़ा एक पत्थर नुमा आकृति 
ले चुका है
और वो मेरी दांतों के बीच 
अपनी जड़ें मजबूत कर के बैठा है
मेरे दोनों हाथ उस चट्टान को बाहर निकालने 
में जुटे हुए हैं
थोड़ी कोशिश के बाद 
दांतों के बीच से लसलसानुमा पदार्थ निकलता है
ठीक वैसे जैसे शहद के छत्ते को एक 
धारदार अस्त्र से काटे जाने पर निकलता है।
अपने मुंह में बैठी मै 
दो उजली चट्टानों के बीच से गुजरती 
हवाओं को महसूस कर रही हूं
शांत, स्वच्छंद, निर्मल वातावरण 
जहां एक जी भर के लंबी सांस खींची जा सकती है।
मेरी जीभ वापस से मुआयने के लिए 
कौतूहल करती है 
और मेरा स्वप्न टूट जाता हैं

Comments

Popular posts from this blog

एक कोशिश

आसमान के कोने से  झूलती हुई एक पहेली  पहेली जों एक गठरी की तरह है अपने आप में बहुत सारे छोर समेटे एक छोर की तलाश अक्सर दूसरे धागे खींच देती है और पहेली एक नए सिरे से दुबारा शुरू होती है धागे के कोने खींचता व्यक्ति थकता है पसीने में डूबता है रुकता भी है पर हर बार वो एक उत्साह से फिर  सबकुछ दुबारा शुरू करता है फिर वही हताशा और फिर वही उत्साह का सिलसिला जारी रहता है एक आस,की गठरी के धागे पुराने हो जाये एक सूरज की किरण, की एक हवा का झोंका आये ओर ये सारी गुत्थियां सुलझा दे जाये एक कोशिश, की एक सुबह सब ठीक हो जाएगा  सब कुछ अनवरत चलता रहता है।

कमरा नंबर 220

बारिश और होस्टल आहा! सुकून। हेलो दी मैं आपकी रूममेट बोल रहीं हूं, दरवाजा बंद है, ताला लगा है। आप कब तक आयेंगी।  रूममेट?  रूममेट, जिसका इंतजार मुझे शायद ही रहा हो। कमरा नंबर 220 में एक शख्स आने वाला है। कमरा नंबर 220, जो पिछले 2 महीनों से सिर्फ मेरा रहा है। सिर्फ मेरा।  मैंने और कमरा नंबर 220 ने साथ-साथ कॉलेज की बारिश देखी है। अहा! बारिश और मेरा कमरा कितना सुकून अहसास देता है। बारिश जब हवा के साथ आती है तो वो कमरे की बालकनी से अंदर आके करंट पानी खेल के जाती है। कमरा, जिसपे मेरा एकाकिक वर्चस्व रहा है। कमरा, जिसमे मैं कॉलेज से आते ही धब्ब से बिस्तर पर पड़ के पंखे के नीचे अपने बाल खोल कर बालकनी से बाहर बादल देखा करती हूं। कमरा, जिसे मैंने अब तक अकेले जिया है।  हेलो? हां, मैं अभी ऑडिटोरियम में हूं, तुम कहां हो? मैं होस्टल में हूं। कमरे के बाहर। कितने देर से खड़ी हो? सुबह से ही आई हूं। ऑफिस का काम करा के ये लोग रूम अलॉट किए है।  अच्छा..... यार मैं तो 6 बजे तक आऊंगी। तुम उम्मम्म.... तुम्हारे साथ कोई और है? पापा थे चले गए वो। अच्छा, सामान भी है? हां, एक बैग है। अभी आना ...

ख्वाब

                   ( Image- Rural Marketing) नये जोड़े मे आंचल के साथ संजो के वो ख्वाब लाई थी बहुत ही हल्के से ख्वाब, हवाऐं अगर उन्हें छूं ले तो वो आंचल छोड़  कहीं उड़ जायेगें इस डर से हर रात सोने से पहले वो उन्हें गिना करती थी कुछ दिन पहले की ही बात है उसके दो ख्वाब आंसुओं के समंदर में खो गये और एक चुल्हे मे जल गये वो उन्हें जितना ढूढ़ती गई उतना ही टूटती गई अब वो उन ख्वाबों को अपने पैरों में बांध के घूमती है।