अभिलाषाओं के मोह जगत में हम भी जीने आए थे ऑंख खुली तो हमने देखी चल रही यहां एक अंधी दौड़ क्या जीना? कैसे जीना है? रोज़ बदलता रहता है पुष्प चाहने वालों को यहां यथार्थ कुचलता रहता है श्वेत नगर के महलों में बैठने जैसी पाली थीं सुंदर अभिलाषा बदल गई धरा पर आकर सारे स्वप्नों की सब भाषा क्या ढूंढ़ा था और क्या पाया? जीवन खुद से ही टकराया उम्र के हर पड़ाव पर हमने खड़ा नया संघर्ष ही पाया कोमल देह,कमल नैनों संग संघर्षों से टकराओगी हवा के जो विपरीत चलोगी यौवन उम्र गवां बैठोगी सलाहों का अंबार पटा है चक्रव्यूह में मन अभिमन्यू सा जकड़ा है राह सुजान बहुत मिलेंगे अपने रस्ते खुद गढ़ने होंगे हे साधिके यह पथ जटिल है समय का चक्का बड़ा कुटिल है फिर भी डटकर लड़ना होगा पीछे हटकर बढ़ना होगा
कल शाम की दावत के बाद मांस का एक टुकड़ा ऊपर के लगे जबड़े से लटकती पिछली दाँत के बीच में जा फसा है। वापस घर आते वक्त वो पूरे रस्ते मेरे जीभ से आंख मिचौली खेलता रहा है मै अपने अथक प्रयास के बावजूद उसे अपने दांतों से निकाल नहीं पाई हूं रास्ते भर के चले इस मसक्कत में मेरा जबड़ा अब दुखने लगा है और अब बस मै सो जाना ही उचित समझती हूं। सुबह उठते ही बिना किसी सोच विचार के मेरी जीभ दांतों के किनारों का मुआयना करने निकल जाती है और पूरे दिन का कार्यक्रम खुद बख़ूद ही तय हो जाता है। टुकड़े को निकाल फेंकने का मिशन इंपॉसिबल शुरू हो चुका है अपनी व्यवहार रूपी आलस्य की खूबियों से भरपूर मैं खुली आंखों से स्वप्न में खो जाती हूं जिसमें मैं देखती हूं अपने विशाल काय दांत और उसे निहारती मेरी आँखें मेरी आँखें देखती है कि मांस का टुकड़ा एक पत्थर नुमा आकृति ले चुका है और वो मेरी दांतों के बीच अपनी जड़ें मजबूत कर के बैठा है मेरे दोनों हाथ उस चट्टान को बाहर निकालने में जुटे हुए हैं थोड़ी कोशिश के बाद...