कल शाम की दावत के बाद मांस का एक टुकड़ा ऊपर के लगे जबड़े से लटकती पिछली दाँत के बीच में जा फसा है। वापस घर आते वक्त वो पूरे रस्ते मेरे जीभ से आंख मिचौली खेलता रहा है मै अपने अथक प्रयास के बावजूद उसे अपने दांतों से निकाल नहीं पाई हूं रास्ते भर के चले इस मसक्कत में मेरा जबड़ा अब दुखने लगा है और अब बस मै सो जाना ही उचित समझती हूं। सुबह उठते ही बिना किसी सोच विचार के मेरी जीभ दांतों के किनारों का मुआयना करने निकल जाती है और पूरे दिन का कार्यक्रम खुद बख़ूद ही तय हो जाता है। टुकड़े को निकाल फेंकने का मिशन इंपॉसिबल शुरू हो चुका है अपनी व्यवहार रूपी आलस्य की खूबियों से भरपूर मैं खुली आंखों से स्वप्न में खो जाती हूं जिसमें मैं देखती हूं अपने विशाल काय दांत और उसे निहारती मेरी आँखें मेरी आँखें देखती है कि मांस का टुकड़ा एक पत्थर नुमा आकृति ले चुका है और वो मेरी दांतों के बीच अपनी जड़ें मजबूत कर के बैठा है मेरे दोनों हाथ उस चट्टान को बाहर निकालने में जुटे हुए हैं थोड़ी कोशिश के बाद...
आसमान के कोने से झूलती हुई एक पहेली पहेली जों एक गठरी की तरह है अपने आप में बहुत सारे छोर समेटे एक छोर की तलाश अक्सर दूसरे धागे खींच देती है और पहेली एक नए सिरे से दुबारा शुरू होती है धागे के कोने खींचता व्यक्ति थकता है पसीने में डूबता है रुकता भी है पर हर बार वो एक उत्साह से फिर सबकुछ दुबारा शुरू करता है फिर वही हताशा और फिर वही उत्साह का सिलसिला जारी रहता है एक आस,की गठरी के धागे पुराने हो जाये एक सूरज की किरण, की एक हवा का झोंका आये ओर ये सारी गुत्थियां सुलझा दे जाये एक कोशिश, की एक सुबह सब ठीक हो जाएगा सब कुछ अनवरत चलता रहता है।