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जमाना

आज बादल चाँद के छुपावत नईखे,
काहे त ई रात ओरियात नईखे ।

सफेद चादर में ढकल बा पुरा रात,
पर मन के अमावस जात नईखे ।

पुरा के पुरा अन्न फेकल बा डिब्बा मे,
इहां जूठन भी डलात नईखे ।

हजारों दिप चमक रहल बा आसमान में,
फीर भी घर में उजाला आवत नईखे ।

चिंगारी देवे वाला के कमी नईखे,
अफसोस, कोई आग बुझावत नईखे ।

फटल कपड़ा मे देखनी ह मुस्कान लिपटल,
मन, लेकिन मानत नईखे ।

कुछ के ऊँच आसन भईल ह,
आ, कुछ लोगन के सोहात नईखे ।

भर के पईसा निकलल बाड़े बजार मे,
दिल, लेकिन खरीदात नईखे ।

हजार कीचड़ उछलल बा जिस्म पे,
पर आत्मा केहूसे छुआत नईखे ।

बड़ा खुबसुरत रचना बा भगवान के,
केहुके  एकरा पर  अख्तियार नईखे ।


Comments

Unknown said…
बहुत सुंदर
suruchi kumari said…
धन्यवाद

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एक कोशिश

आसमान के कोने से  झूलती हुई एक पहेली  पहेली जों एक गठरी की तरह है अपने आप में बहुत सारे छोर समेटे एक छोर की तलाश अक्सर दूसरे धागे खींच देती है और पहेली एक नए सिरे से दुबारा शुरू होती है धागे के कोने खींचता व्यक्ति थकता है पसीने में डूबता है रुकता भी है पर हर बार वो एक उत्साह से फिर  सबकुछ दुबारा शुरू करता है फिर वही हताशा और फिर वही उत्साह का सिलसिला जारी रहता है एक आस,की गठरी के धागे पुराने हो जाये एक सूरज की किरण, की एक हवा का झोंका आये ओर ये सारी गुत्थियां सुलझा दे जाये एक कोशिश, की एक सुबह सब ठीक हो जाएगा  सब कुछ अनवरत चलता रहता है।

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