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जमाना

आज बादल चाँद के छुपावत नईखे,
काहे त ई रात ओरियात नईखे ।

सफेद चादर में ढकल बा पुरा रात,
पर मन के अमावस जात नईखे ।

पुरा के पुरा अन्न फेकल बा डिब्बा मे,
इहां जूठन भी डलात नईखे ।

हजारों दिप चमक रहल बा आसमान में,
फीर भी घर में उजाला आवत नईखे ।

चिंगारी देवे वाला के कमी नईखे,
अफसोस, कोई आग बुझावत नईखे ।

फटल कपड़ा मे देखनी ह मुस्कान लिपटल,
मन, लेकिन मानत नईखे ।

कुछ के ऊँच आसन भईल ह,
आ, कुछ लोगन के सोहात नईखे ।

भर के पईसा निकलल बाड़े बजार मे,
दिल, लेकिन खरीदात नईखे ।

हजार कीचड़ उछलल बा जिस्म पे,
पर आत्मा केहूसे छुआत नईखे ।

बड़ा खुबसुरत रचना बा भगवान के,
केहुके  एकरा पर  अख्तियार नईखे ।


Comments

Unknown said…
बहुत सुंदर
suruchi kumari said…
धन्यवाद

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कमरा नंबर 220

बारिश और होस्टल आहा! सुकून। हेलो दी मैं आपकी रूममेट बोल रहीं हूं, दरवाजा बंद है, ताला लगा है। आप कब तक आयेंगी।  रूममेट?  रूममेट, जिसका इंतजार मुझे शायद ही रहा हो। कमरा नंबर 220 में एक शख्स आने वाला है। कमरा नंबर 220, जो पिछले 2 महीनों से सिर्फ मेरा रहा है। सिर्फ मेरा।  मैंने और कमरा नंबर 220 ने साथ-साथ कॉलेज की बारिश देखी है। अहा! बारिश और मेरा कमरा कितना सुकून अहसास देता है। बारिश जब हवा के साथ आती है तो वो कमरे की बालकनी से अंदर आके करंट पानी खेल के जाती है। कमरा, जिसपे मेरा एकाकिक वर्चस्व रहा है। कमरा, जिसमे मैं कॉलेज से आते ही धब्ब से बिस्तर पर पड़ के पंखे के नीचे अपने बाल खोल कर बालकनी से बाहर बादल देखा करती हूं। कमरा, जिसे मैंने अब तक अकेले जिया है।  हेलो? हां, मैं अभी ऑडिटोरियम में हूं, तुम कहां हो? मैं होस्टल में हूं। कमरे के बाहर। कितने देर से खड़ी हो? सुबह से ही आई हूं। ऑफिस का काम करा के ये लोग रूम अलॉट किए है।  अच्छा..... यार मैं तो 6 बजे तक आऊंगी। तुम उम्मम्म.... तुम्हारे साथ कोई और है? पापा थे चले गए वो। अच्छा, सामान भी है? हां, एक बैग है। अभी आना ...

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तुम्हारे पर्दे से टपकता खून  कभी तुम्हारा फर्श गंदा नहीं करता वो किनारे से लग के  बूंद बूंद रिसता है  मुझे मालूम है कि  हर गुनाहगार की तरह  तुम्हे, तुम्हारे गुनाह मालूम है पर तुम्हारा जिल्ल ए इलाही बन  सबकुछ रौंद जाना  दरवाजे पर लटके पर्दे पर  और खून उड़ेल देता है।