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दुनिया रंग बिरंगा



न जाने कितने इमारत बने हैं कागजों पे
न जाने कितने जिंदा लाशें सड़कों पे चल रहि है ।

चलिये उन सब से भी उनका हाल पूछ लेते हैं
जो सालों से कब्रों मे कैद है

न जाने कितने लोगों ने
कितने जीवन उथल-पुथल कर दी है
चलिए उन चंद लोगों को
आज ढूंढ लेते है

यू तो मगरूर इमारतें
ताकतों का प्रदर्शन करती है
कुछ चन्द गार मिट्टी से
चलिए अपना आशियाँ बना लेते हैं ।

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