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घर



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तुमने जो यादें छोड़ दि थी
मेरे पास
युहि फटे हाल में
जिसे तुमने  एक बार भी
मुड़ के देखने की कोशिश तक न की
वो पल जो तुमने जिये
उन्हे छोड़ आये तुम
मेरे दर पर या
तुम्हारी जेब से सरक कर
मेरे पास पहुँच ग ई
वो सब मैने संभाल के
लिफाफे में रख दिया है
उन आँखों के दिये मे तुम
हर रोज मुझे देखा करते थे
वो दिपक बुझा आये तुम
एक चांद कि याद मे
भीनी-भीनी खुशबू
जो मेरे घर में
बिखेर के
उसे रौंद आये तुम
किसी की चाह मे
वो घर मैने सजा लिया है ।
कभी गुजरो इन गलियों से
तो अपना दिल लेते जाना
पता नहीं तुम कैसे दिल लगाते फिरते हो ।

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