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I deserve





I deserve a cup of coffee.
I deserve an elaborate conversation.
I deserve to be heard
and to be listened patiently.
I deserve to have my opinion
right there on the table.
I deserve a call.
I deserve few messages.
I deserve to be treated like the choice you made 
not the option that you left.

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एक कोशिश

आसमान के कोने से  झूलती हुई एक पहेली  पहेली जों एक गठरी की तरह है अपने आप में बहुत सारे छोर समेटे एक छोर की तलाश अक्सर दूसरे धागे खींच देती है और पहेली एक नए सिरे से दुबारा शुरू होती है धागे के कोने खींचता व्यक्ति थकता है पसीने में डूबता है रुकता भी है पर हर बार वो एक उत्साह से फिर  सबकुछ दुबारा शुरू करता है फिर वही हताशा और फिर वही उत्साह का सिलसिला जारी रहता है एक आस,की गठरी के धागे पुराने हो जाये एक सूरज की किरण, की एक हवा का झोंका आये ओर ये सारी गुत्थियां सुलझा दे जाये एक कोशिश, की एक सुबह सब ठीक हो जाएगा  सब कुछ अनवरत चलता रहता है।

कमरा नंबर 220

बारिश और होस्टल आहा! सुकून। हेलो दी मैं आपकी रूममेट बोल रहीं हूं, दरवाजा बंद है, ताला लगा है। आप कब तक आयेंगी।  रूममेट?  रूममेट, जिसका इंतजार मुझे शायद ही रहा हो। कमरा नंबर 220 में एक शख्स आने वाला है। कमरा नंबर 220, जो पिछले 2 महीनों से सिर्फ मेरा रहा है। सिर्फ मेरा।  मैंने और कमरा नंबर 220 ने साथ-साथ कॉलेज की बारिश देखी है। अहा! बारिश और मेरा कमरा कितना सुकून अहसास देता है। बारिश जब हवा के साथ आती है तो वो कमरे की बालकनी से अंदर आके करंट पानी खेल के जाती है। कमरा, जिसपे मेरा एकाकिक वर्चस्व रहा है। कमरा, जिसमे मैं कॉलेज से आते ही धब्ब से बिस्तर पर पड़ के पंखे के नीचे अपने बाल खोल कर बालकनी से बाहर बादल देखा करती हूं। कमरा, जिसे मैंने अब तक अकेले जिया है।  हेलो? हां, मैं अभी ऑडिटोरियम में हूं, तुम कहां हो? मैं होस्टल में हूं। कमरे के बाहर। कितने देर से खड़ी हो? सुबह से ही आई हूं। ऑफिस का काम करा के ये लोग रूम अलॉट किए है।  अच्छा..... यार मैं तो 6 बजे तक आऊंगी। तुम उम्मम्म.... तुम्हारे साथ कोई और है? पापा थे चले गए वो। अच्छा, सामान भी है? हां, एक बैग है। अभी आना ...

एक दावत

 कल शाम की दावत के बाद  मांस का एक टुकड़ा  ऊपर के लगे जबड़े से लटकती पिछली दाँत के बीच में जा फसा है। वापस घर आते वक्त वो पूरे रस्ते मेरे जीभ से आंख मिचौली खेलता रहा है मै अपने अथक प्रयास के बावजूद  उसे अपने दांतों से निकाल नहीं पाई हूं रास्ते भर के चले इस मसक्कत में मेरा  जबड़ा अब दुखने लगा है और  अब बस मै सो जाना ही उचित समझती हूं। सुबह उठते ही बिना किसी सोच विचार के  मेरी जीभ दांतों के किनारों का मुआयना  करने निकल जाती है  और पूरे दिन का कार्यक्रम खुद बख़ूद  ही तय हो जाता है। टुकड़े को निकाल फेंकने का  मिशन इंपॉसिबल शुरू हो चुका है अपनी व्यवहार रूपी आलस्य की  खूबियों से भरपूर मैं  खुली आंखों से स्वप्न में खो जाती हूं जिसमें मैं देखती हूं  अपने विशाल काय दांत  और उसे निहारती मेरी आँखें  मेरी आँखें देखती है कि  मांस का टुकड़ा एक पत्थर नुमा आकृति  ले चुका है और वो मेरी दांतों के बीच  अपनी जड़ें मजबूत कर के बैठा है मेरे दोनों हाथ उस चट्टान को बाहर निकालने  में जुटे हुए हैं थोड़ी कोशिश के बाद...