आसमान के कोने से
झूलती हुई एक पहेली
पहेली जों एक गठरी की तरह है
अपने आप में बहुत सारे छोर समेटे
एक छोर की तलाश
अक्सर दूसरे धागे खींच देती है
और पहेली एक नए सिरे से दुबारा शुरू होती है
धागे के कोने खींचता व्यक्ति थकता है
पसीने में डूबता है
रुकता भी है
पर हर बार वो एक उत्साह से फिर
सबकुछ दुबारा शुरू करता है
फिर वही हताशा और फिर वही उत्साह
का सिलसिला जारी रहता है
एक आस,की गठरी के धागे पुराने हो जाये
एक सूरज की किरण, की एक हवा का झोंका आये
ओर ये सारी गुत्थियां सुलझा दे जाये
एक कोशिश, की एक सुबह सब ठीक हो जाएगा
सब कुछ अनवरत चलता रहता है।
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