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राजा

राजा को नींद बहुत पसंद है वो रोज मखमली गद्दे पे सोया करता है। वो जनता है इस गद्दे को बनाने वाले  हाथों को। वो जनता है की जब रूई कुटी  जा रही थी उस समय  गलती से करिंदे के हाथ में  चोट आ गई  और करिंदा अब कुछ महीनों तक  काम नहीं कर पाएगा इसके बावजूद राजा ने उसके दुकान  बंद करने का ऐलान कर दिया। राजा जनता था की गद्दे की सिलाई  करते वक्त मशीन की सूई  दूसरे कारीगर के उंगली में जा लगी थी कारीगर 2 दिनों का आराम चाहता था पर राजा ने उसे उम्र भर का आराम दे दिया। राजा जनता था की जिस गद्दे पर वह  चैन की नींद सोता है  उस गद्दे को बनाने के लिए कोई  अपना चैन गवाता है फिर भी राजा चादर तान  पेट के बल सोता है।

गुलदस्ता वाला चेहरा

शायद वो भूल गया है मुझे  3 हफ्ते हो गए और मेरी कोई  खबर नहीं। क्यों जरूरी हूं मैं उसके लिए  उसके जिंदगी में बहारों की  क्या कमी है? मोबाइल की नोटिफिकेशन  निहारती मै, उसके मेसेजेज का वेट करती मै, कितनी अजीब लगती हूं। खुद से बातें करके मैने  घर के कोने में एक  बड़ा सा ऊन का गट्ठर तैयार कर लिया है रोज उस गट्ठर को सुबह-शाम देखती हूं दोपहर को उसके कंधे पर सोती हूं और  शाम ढले उसके बाहों से सरक कर फिर से जमीन पर आ लगती हूं। जब गट्ठर से जी भर जाए तो  फिर से मोबाइल का नोटिफिकेशन  निहार लेती हूं  और फिर से वही निराशा। कितनी दयनीय हो गई हूं मैं! कल सुबह उठ के मैने यही सोचा  की मैं आज उस ऊन के गट्ठर को  खिड़की से बाहर फेक दूंगी और उस जगह पर खुद को सजाऊंगी और आज जब खिड़की खोली तो  वो अपने गुलदस्ते वाले चेहरे के साथ खड़ा था।

कचरे का ढेर

                                              शिवानी  मैं कचरे के ढेर में रहती हूं और इस ढेर में रहते हुए  खुद को दूसरों से अलग दिखाने की  पुरजोर कोशिश करती रहती हूं पूरी जिंदगी। निम्न अस्तर के कचरे में रहने वाले  लोगों से मुझे एक अजीब सी 'बु' आती है मैं जब उनकी गली से गुजरती हूं  तो नाक पर हाथ का चले जाना  बहुत आम प्रक्रिया होती है। 'बु' वाले घर से मेरे घर एक लड़की काम  करने आती है। मैं अपनी कुर्सी पे बैठी होती हूं और वो सामने बने सीढ़ियों पे बैठती है। मुझे नहीं पता उसके घर के खाने का स्वाद पर वो जानती है मेरे घर क्या पकता है मैने कभी उसका चूल्हा नहीं देखा  पर वो रोज मेरा बर्तन साफ कर के ही घर जाती है। पूजा के समय वो पीतल के बर्तन नहीं धुलती पर अम्मा को जब पूजा करते करते कमर में  तेज दर्द होता है तो  वो पूरे बदन की मालिश जरूर करती है। अम्मा ने बक्से से एक चमकीली साड़ी  निकाली है। और वो साड़ी अब उन्हें नई लग रही सो उन्ह...

नाजुक से मर्द

बड़े नाजुक से मर्द है मेरे घर में  10 कदम भी नहीं चल सकते बेचारे  औरतों ने बोतल के बोतल पानी  से भर कर फ्रिज सजा दिया  पर फूल से हमारे मर्द से  फ्रिज का दरवाजा तक ना खुला। बड़े नाजुक से मर्द है मेरे घर में। बड़ी डींगें मारते है घर के बाहर  घर आते ही उन्हें अपना कुम्हलाया  बदन याद आ जाता है। वो लोहे की बनी औरतों से  अपना दुख गाया करते हैं  बड़े नाजुक से मर्द है मेरे घर में। और याददाश्त तो कहिए नहीं पाउती में बंद करके फेक आए है बेचारे जहां खाते है थाली वही छोड़ देते है बड़े नाजुक से मर्द है मेरे घर में।  ऐसा नहीं की निक्में है सब  बाहर नारी सशक्तिकरण  के नारे लगाते है  और घर की दहलीज पर कदम रखते ही लोहे के बनी औरतें को अपना  ऑर्डर दे देते है।  बड़े नाजुक से मर्द है मेरे घर में।

खबरें विस्तार से

नमस्कार, आप सबका स्वागत है खबरें विस्तार से में।  आज की हमारी पहली खबर आई है शामपुर से। शामपुर में एक औरत ने मौसम को देखते हुए तीज करने से किया इन्कार। महिला का कहना है की वो इतने गर्मी के मौसम में निर्जला व्रत नहीं रख सकती। हालांकि उसने अपने ससुरालवालों से बात की थी की क्या इस व्रत को पानी के साथ रख ले? पर ससुरालवालोंं ने साफ इन्कार कर दिया। उन्होंने अपने पुरखों से चली आ रही इस व्रत को अपना धर्म बताया है। महिला के इन्कार कर देने से उसके पति अब काफी चिंतित है। क्योंकि उन्हें हर साल मिलने वाला अमृत इस साल नही मिल पाएगा। जिससे उनके जान जाने की भी कयास लगाई जा रही है। दूसरी तरफ एक यह भी हवा रिपोर्ट आई है की महिलाओं का मानना है की तीज की वजह से उनके पति अमर हो जाने के कगार पे है। और वो इस बात से काफी खफ़ा है। उनके अमर हो जाने से घरेलू हिंसा में और भी वृद्धि हो सकती है। बहरहाल इसका कोई ठोस उपाय अभी तक महिलाएं नहीं ढूंढ पाई है।  आज की हमारी दूसरी खबर है दोपहरवादी से। दोपहरवादी के एक रेस्टुरेंट में एक ब्वॉयफ्रेंड ने अपने गर्लफ्रेंड का बिल पे कर दिया और इस बात से नाराज गर्लफ्रेंड ने व...

घर-घर

ये चाचा, चाचा.... मोहन अपनी तेज आवाज से रामप्रसाद को दरवाजे पे खड़ा हो पुकार रहा था।  अरे! सुन रहे है की नहीं? का हो गया है, लगे हो गला फाड़े। रामप्रसाद घर से निकलते निकलते बोलते है। अरे राजुवा बियाह करके लइकी ले आया है।  रामप्रसाद- सबेरे सबेरे पी के आया है का? मोहन - नहीं चाचा हम सच कह रहे है। अपना आँख से देख के आ रहे है। रामप्रसाद बस खड़े रहे। वो मोहन को ऐसे देख रहे थे जैसे वो पता नही क्या कह दिया है। वो अपने कानों पे भरोसा नहीं कर पा रहे थे।  राजू गांव का सबसे होनहार लड़का था। बड़ा ही शांत स्वभाव का इंसान। शान्ति से रहना, किसी से झगड़ा ना करना और सादे से लिबास में रहना।   गांव में उसकी यही पहचान थी। गांव के सारे लोग उसका ही उदाहरण अपने बच्चों को देते। देखो, राजू की तरह बनो। राजू ये राजू वो सुन सुन के गांव के बच्चे तंग हो गए थे पर उनके मां बाप उदाहरण देते ना थकते थे।  काठ मार दिया का आपको? मोहन ने आवाज ऊंची करके रामप्रसाद को वर्तमान में लाने की कोशिश की।  मुखिया जी कैसे है? रामप्रसाद ने अचानक से पूछा। मोहन - ठीक तो नहीं दिखे वो हमको। हम ज्यादा देख भी...

आईना

दीवार पर टंगा आईना  क्या तुम्हे देखता है?  या, तुम उसे निहारती हो क्या देखती हो आईने में? खुद को या, उन नज़रों को जो तुम्हे देखते है। क्या ढूंढती हो आईने में? अभी का सच  या, कुछ देर में आने वाली बहार। क्या तलाशती हो आईने में? खुद को या, पीछे छूट चुके पल को। माथे की बिंदी जो तुम  आईने पर टाक जाती हो उसमे कोई अपना चेहरा  निहार जाता है। अपने चेहरे को बिंदी की जगह रख कर खुद को सजा जाता है। तुम क्या झंझोरती हो आईने से  उसे, या, उसके देखे रूप को। बिस्तर के एक कोने में बैठा शख्स  तुम्हे आईने से दूसरे कोने में तलाशता है दूसरे कोने में बैठी तुम  आईने से क्या पूछती हो? उसकी नज़रों का सच  या, उसके पीछे की उधेड़बुन  जो शायद टूट कर बिखर जाना चाहता है।