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दोपहरी

 खिली धूप, हवा मे झूमते प़ेड

और जवान होती दोपहरी

अपनी आँखें टिकाये

दिन का भोग विलास कर रहे है

ये ठंडी हवाएं मदिरा कि भांति

उनके मन को उडाये जा रही है

पत्तों का आलिंगन उनके

हृदय में सेंध लगाये जा रहा है

खुला, नीला आसमान

पेड़ को अपनी आगोश में

भर लेना चाहता है

सूरज अपनी सासों से

नदी का धड़कन संभाले हुए हैं

सितारों की चुनर ओढ़ के

चाँद सोने को आतुर है

इन सबसे दूर हिमालय

अपनी ही स्वाधीनता मे

लिन हो जाना चाहता है।



Comments

@9jali @9@9d said…
Liveful lines🥰👌👌👌💕
suruchi kumari said…

😊😊😊😊धन्यवाद

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एक कोशिश

आसमान के कोने से  झूलती हुई एक पहेली  पहेली जों एक गठरी की तरह है अपने आप में बहुत सारे छोर समेटे एक छोर की तलाश अक्सर दूसरे धागे खींच देती है और पहेली एक नए सिरे से दुबारा शुरू होती है धागे के कोने खींचता व्यक्ति थकता है पसीने में डूबता है रुकता भी है पर हर बार वो एक उत्साह से फिर  सबकुछ दुबारा शुरू करता है फिर वही हताशा और फिर वही उत्साह का सिलसिला जारी रहता है एक आस,की गठरी के धागे पुराने हो जाये एक सूरज की किरण, की एक हवा का झोंका आये ओर ये सारी गुत्थियां सुलझा दे जाये एक कोशिश, की एक सुबह सब ठीक हो जाएगा  सब कुछ अनवरत चलता रहता है।

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