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हर॒रोज

सुबह का कोहरा धूप को निकलने की  इजाजत नहीं दे रहा था। चारों ओर धुआं धुआं सा फैला था । मीरा खिड़की से झांकते हुए बाहर के मौसम को आँखों में भर लेना चाहती थी। तभी  उसने देखा बाहर उसके बाबा किसी से बात कर रहे है, वह व्यक्ति काले कंबल में लिपटा जाना पहचाना लग रह था। मीरा ने गौर से देखने की कोशिश की, अरे, ये तो रिया के पापा है । ये यहां क्या कर रहे है ॽ ओर बाबा से क्या बात कर रहे हैॽ खैर, कुछ भी हो वो खुश थी  आज उसे मौका मीला है  उनकी  आवभगत करने का। वह दौड़ी दौड़ी बाहर आई, अपने साँसों को थामते हुए बोली, माँ रिया के पापा  आये हैं । माँ ने इसका कोई जवाब नहीं दिया । माँ, मैं उनके लिए नाश्ता ले कर जाऊं ॽ बर्तन खाली नहीं है,  उन्होंने खिजते हुए कहा । पर इतने सारे तो बर्तन तो पड़ है यहां पर, उसने बर्तन की टोकरी की ओर देखते हुए कहा । कहा न, कोई बर्तन खाली नहीं है, मुझे ढूढना पड़ेगा,  ओर वैसे भी वो मेरे यहां कोई नास्ता ॒पानी  करने नहीं आये हैं, काम से आये हैं । माँ ने गुस्से से कहा । और अभी  इतना सवेरा है इतनी सुबह नास्ता कौन करता है ...

अटल

आशाओं से ओतप्रोत, दिल में स्वदेश का प्रेम  उफल है, वही अटल है । मन में न कभी है क्रोध, न है द्वेष की भावना, दिल में प्रेम सागर लिये बूंद बूंद जो बाँट रहा है, वही अटल है । दोस्त,  मित्र, गुरूवर सा व्यक्तित्व शब्दों सा निश्चल चरित्र, बूंद बूंद से रेतो को जो सिंच, उपवन बना रहा है, वही अटल है । ना डर के कदम छिपाए जो, डट कर हर मुश्किल से लड़ जाए जो, विपत्तियों मे बिना विवेक खोये जो शिखर सा तना हुआ है, वही अटल है ।

कश्मकश

Listen to my latest performance on YourQuote app at https://www.yourquote.in/suruchi-kumari-fpjd/quotes/maanaa-kii-main-yaad-nhiin-tumhen-jedae/ माना, कि मैं याद नहीं तुम्हें, फिर भी हर इबादत में मेरा नाम क्यू हैॽ खुबसुरत काली आँखो में, बेवजह ये मोती क्यू हैॽ माना, मेरी यादें चुभती है तुम्हारे दिल में, पर, तुम्हारी धड़कनों पे मेरा राज क्यू हैॽ बंद अंधेरे कमरे में भी, एक रौशनी की आश क्यू हैॽ माना,  मेरी शक्ल भी पसंद नहीं तुम्हें, पर, तुम्हारे मन में मेरा दर्पण क्यू हैॽ होठों पर एक शब्द भी नहीं, पर, इन आँखों में सैलाब क्यू हैॽ 

Visionary Words

On the 26th of January 1950, we are going to enter a life of contradictions. In politics, we will have equality and in social and economic life we will have inequity. In politics, we will be recognizing the principle of one man one vote and one vote one value. In social and economic structure, continue to deny the principle of one man one value. How long shall we continue to live this life of contradictions? How long shall we continue to deny equality in our social and economic life? If we continue to deny it for long, we will do so only by putting our political democracy in peril.

Lost

Sometimes you feel cherishable, sometimes very happy that you yourself can't recognize what to do and what to say? Apart from all these days, there is a category of those days, in which you feel completely lost. You don't know what to do, whom to have a conversation, and what to think even. Maybe human nature. Someday I feel like the same, like I lost, then I don't know what to do. To feel the gap of emptiness I try to talk to some of my friends( I regularly talk to my parents but sometimes you need your friends)then I realize that I am trying hard to be in that conversation😔😔 no one is taking interested not even texting back. If I talk about my friend list on FB then currently there are 205 friends of mine, some just face that I recognize, I barely know them. So the point is apart from spending so many times in the so-called social media friend circle, I still felt lost. (I barely talk to any FB friends😃😃). The point is everyone is in motion, they are living there ...

तन्हाई

वो यादों की  एक हसीन दुनिया, तुम्हारे आँखों से सब कुछ कह जाना, रूठ कर यू मान जाना, सब कुछ तो है मेरे पास बस, तुम नहीं हो। छुप छुप के देखना, हर बात पे हँसना, पेड़ की छांव में  इन्तजार करना, सब कुछ तो है मेरे पास बस, तुम नहीं हो। वो महकी सी खुशबू, बच्चों सी मासूमियत, चाँद सी शीतलता, सब कुछ तो है मेरे पास बस, तुम नहीं हो ।

ख्वाहिश

जो रास्ते कल तक अधूरा छोड़ जाते थे मुझे, आज उन्होंने ही सलीके से रास्ता दिखाया है । रोज जिन्हें सड़कों पे ढूंढा करती थी, आज उन्हें अपने ही सपने में  पाया है । बडे शिद्दत से कोशिश की है, उन नैन नख्शों को एक पन्ने पर उतार सकू । दीवार पे टंगी उस तस्वीर को पूरे दिन ना सही, कम से कम दो पल तो निहार सकू । उलझनो मे लिपटी, खुद से लडती, कभी आसमां की ओर देख लीया करती हूं । मन भर जाये जब चेहरे देख के, तो किसी के दिल में  झांक लिया करती हूँ । मन भी बड़ा अजीब है, तरह-तरह के ख्वाब यू ही सजा लेता है । एक कमरे में बंद शख्स को भी, आसमां की  शैर करा लाता है । चहारदीवारी से आज ये शरीर बाहर जाना चाहता है पुरे करने कुछ ख्वाब अधूरे, बडते कदम आज फिर रुके है, उन सपनो को मान के पुरे । आँखों की सीमा नहीं है, सिर्फ उन ढलती सिढियो के कोने तक उनकी मंजिल तो कहीं दुर है, किसी  और  के होने तक । माना,  कि मेरे पैरों में बेड़ियां है मेरे पंख कुतरे जा चुके है,  पर मन तो नहीं, माना, मेरा शरीर  एक पिंजरे में बंद हैं, ख्वाहिशों के जुगनू मर चुके है,...