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सपने

                           (📷@anand_aadarsh) just check out his more clicks on Instagram.  बंद आँखों से कलियों ने सपने देखें हैं सपने, भौरों के आस-पास मंडराने के। सपने, उन्हें खिलते देख बाकियों को  उनके चारो तरफ मंडराने के। सपने, जो उन्हे तेज धूप, थपेड़ों और  बुरी नजरों से बचाए। सपने, जो उनके आँख खुलते ही उनके ख्वाब सच होते जाए। सपने, जो उन्हे बगिये में सबसे खूबसूरत बनाये। सबके लाड़ले और सबके प्यारे। कलियों को यह मालूम नहीं कि बंद आँखों से सपने देखना  अंधेरे में रंग भरने जैसा है।  आँख खुलते हि सारी ख्वाहिशों का गला सूखने लगता है  और प्यास से वो अपना दम तोड़ देती हैं।

जिंदगी की रेस

  📷@anand_aadarsh  कभी जिंदगी में ठहरना नहीं सीखा  जब भी सीखा तो बस चलते रहना  एक रास्ते से दूसरे रास्ते की ओर  बेमन से भागते रहना।  रास्तों को पैरों तले रौंद के  हम पहूंच भी कहां गए है? पिछले वाले मुहाने पर  गुलाब की बस एक झलक देखी  भीड़ से छूट जाने के डर से  दो पल रुक के निहार भी न सकी। बारिश के दिन छत ढूंढने में गुजरे और सर्दी उस छत से सिकुड़ कर  जिंदगी की रेस में बने रहने के लिए  हर रोज अपने मन को खूटी पे टांग कर निकलती रही।  जिंदगी में ठहराव की कीमत होती है  दो पल का सुकून, थोड़ी सी चैन की सांस, बाहरी नजारे को आंखो में भरने की खुशी  और शायद गुम हो जाने का डर।

कहानी सी जिंदगी

 हर रास्ते के मोड़ पे आके  एक नए रास्ते की तालाश होती हैं हर रास्ते की अपनी एक कहानी है, सीख है, दर्द है, तकलीफ है।  पीछे मुड़ कर देखने पर एक  कहानी सी लगती है ज़िंदगी क्या जिंदगी कहानी है? क्या मैं एक कहानी लिख रही हूं?

कुछ सवाल

  क्या जिंदगी के मायने होंगे अब  तुम्हारे लिए ? क्या तुम वही रहोगी? या तुम किसी और के रंग में रंगोगी? या किसी रंग में रंग के भी  अपना रंग बिखेरोगी? क्या जिंदगी बदल जायेगी तुम्हारी? क्या तुम्हे अपने बालों को छोटा करने की इजाजत मिलेगी?  क्या है ये जिंदगी तुम्हारे लिए क्या ये नई है?  क्या तुम्हे इस में कुछ भी नया सा लगता है, या ये वही पुरानी जिंदगी  नई चमचमाती साड़ी पहन कर  तुम्हारे सामने आ गई है? कितनी इजाजत है तुम्हे, और कितनी पाबंदी  और सबसे जरूरी सवाल पूछ रही हूं क्या तुम खुश हो वहां?

किरण

  कुछ किरणें अपनी मुट्ठी  में बांध ली है मैने  ताकि अंधेरा छाने पर  अपनी मुठ्ठी खोल  आगे का रास्ता देख सकूं  कभी कभी सोचती हूं इन किरणों के बिना  क्या हूं मैं? क्या मैं वही छोटी सी बच्ची हूं  जिसका बचपन मैं दोहरा रही हूं, या मैं खुद में सिमटी  थोड़ी सी उस बच्ची से मिलती_जुलती एक अलग बच्ची हूं?  बीते हुए कल की बच्ची  में और मुझमें  सिर्फ इतना ही फर्क है  की मेरे पास किरणें है।

याद

  अच्छा सुनो,  तुम्हे याद है, मैने तुमसे कहा था  मुझे चिट्ठियां लिखने का शौक हैं मैं आज तुम्हे लिखना चाहती हूं कि  तुम पे हल्के रंग के कपड़े जचते हैं  तुम जब हंसते हो तो अच्छे लगते हो  तुम्हारे भेजे गए एमोजि का मतलब समझने लगी हूं  मैं तुम्हे लिखना चाहती हूं कि  तुम्हारी अनकही बातो को सुनने लगी हूं  बस, ना समझने की नाकाम कोशिश करती हूं इस खत में मेरा सिर्फ एक सवाल है  अच्छा छोरो, जाने दो, नहीं पूछती  हां, सुनो  शादी के गीतों से मुझे तुम्हारी याद आती हैं

शून्य

  दिल में एक अजीब सी बेचैनी है एक घबराहट, नहीं, शायद डर नहीं नहीं शायद कुछ भूल रही  कुछ है पर पता नहीं क्या  दिन की चाल ठीक- ठाक है  रातों को ना जाने क्यों  नींद ना आने की बीमारी है  मेरे सिरहाने बैठ  उजाले को अपने बालों में कैद करके रखतीं हैं  अंधेरे को लगता है  वो मुझे डरा रहा है  पर उसे क्या पता  मैं उसके सानिध्य में  कितनी निखरती जा रही हूं  शून्य हूं पर पूर्ण हूं।