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जीवन द्वंद और मेरी रात

अभिलाषाओं के मोह जगत में 
हम भी जीने आए थे 
ऑंख खुली तो हमने देखी 
चल रही यहां एक अंधी दौड़ 

क्या जीना? कैसे जीना है?
रोज़ बदलता रहता है 
पुष्प चाहने वालों को यहां 
यथार्थ कुचलता रहता है 

श्वेत नगर के महलों में बैठने 
जैसी पाली थीं सुंदर अभिलाषा 
बदल गई धरा पर आकर 
सारे स्वप्नों की सब भाषा 

क्या ढूंढ़ा था और क्या पाया?
जीवन खुद से ही टकराया 
उम्र के हर पड़ाव पर हमने 
खड़ा नया संघर्ष ही पाया 

कोमल देह,कमल नैनों संग 
संघर्षों से टकराओगी 
हवा के जो विपरीत चलोगी 
यौवन उम्र गवां बैठोगी 

सलाहों का अंबार पटा है 
चक्रव्यूह में मन अभिमन्यू 
सा जकड़ा है
राह सुजान बहुत मिलेंगे 
अपने रस्ते खुद गढ़ने होंगे 

हे साधिके यह पथ जटिल है
समय का चक्का बड़ा कुटिल है
फिर भी डटकर लड़ना होगा
पीछे हटकर बढ़ना होगा 







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