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8 बजे






हर शाम की आखिरी मुलाकात 
को 8 बजे के आखिरी सेकंड से 
चुरा के अपने बस्ते में 
छुपा लाई हूं।
वो वक्त वही रुका है, 
उस रास्ते पे शाम ढलेगी 
सुबह का सूरज निकलेगा
लोगों के जमावड़े होंगे
अनवरत बातों का सिलसिला होगा 
पर अब घड़ी के सूई 
8 तक नहीं पहुंचेगी। 

Comments

Legit Info said…
Just love your writting. Keep it up. Pehele gam hota tha ki 8 baje kyun par abb gam hai ki woh gam kyun nhi hai.

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एक कोशिश

आसमान के कोने से  झूलती हुई एक पहेली  पहेली जों एक गठरी की तरह है अपने आप में बहुत सारे छोर समेटे एक छोर की तलाश अक्सर दूसरे धागे खींच देती है और पहेली एक नए सिरे से दुबारा शुरू होती है धागे के कोने खींचता व्यक्ति थकता है पसीने में डूबता है रुकता भी है पर हर बार वो एक उत्साह से फिर  सबकुछ दुबारा शुरू करता है फिर वही हताशा और फिर वही उत्साह का सिलसिला जारी रहता है एक आस,की गठरी के धागे पुराने हो जाये एक सूरज की किरण, की एक हवा का झोंका आये ओर ये सारी गुत्थियां सुलझा दे जाये एक कोशिश, की एक सुबह सब ठीक हो जाएगा  सब कुछ अनवरत चलता रहता है।

कमरा नंबर 220

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एक दावत

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