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साधारण




कितना साधारण है रोज मर्रा की जिंदगी में 
मौत की खबरें देखना और सुनना।
कितना साधारण है दिन दहाड़े चोरी 
की खबरें पढ़ना।
कितना साधारण है पानी में बढ़ते आर्सेनिक 
की मात्रा को नजरअंदाज करना।
कितना साधारण है हर साल 
बारिश के महीने में पुलों का धराशाई हो जाना।
कितना साधारण है बाढ़ में 
लोगों से उनका बसेरा छीन जाना।
कितना साधारण है गर्मी के दिनों में
पानी की किल्लत सहना।
कितना साधारण है खुली हवा में सांस ना लेना।
कितना साधारण है रोड पे कूड़े का अंबार होना।
कितना साधारण है महंगाई का आसमान छूना।
कितना साधारण है परीक्षाओं में अनियमितता 
अगर कुछ असाधारण है तो वो है संप्रदाइक दंगे 
और उस से उपजा साधारण लोगों की जाती जानें।
असाधारण है अंतर्जातीय विवाह 
पर साधारण है उसके अग्नि से निकले 
अपने आपको बचाती लपटे। 
असाधारण है विदेशों में घटने वाले किस्से 
और साधारण है अपने ही घर को सुलगता हुआ देखना। 

Comments

Akash Tripathi said…
Badhiya💯❤ 👏

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कमरा नंबर 220

बारिश और होस्टल आहा! सुकून। हेलो दी मैं आपकी रूममेट बोल रहीं हूं, दरवाजा बंद है, ताला लगा है। आप कब तक आयेंगी।  रूममेट?  रूममेट, जिसका इंतजार मुझे शायद ही रहा हो। कमरा नंबर 220 में एक शख्स आने वाला है। कमरा नंबर 220, जो पिछले 2 महीनों से सिर्फ मेरा रहा है। सिर्फ मेरा।  मैंने और कमरा नंबर 220 ने साथ-साथ कॉलेज की बारिश देखी है। अहा! बारिश और मेरा कमरा कितना सुकून अहसास देता है। बारिश जब हवा के साथ आती है तो वो कमरे की बालकनी से अंदर आके करंट पानी खेल के जाती है। कमरा, जिसपे मेरा एकाकिक वर्चस्व रहा है। कमरा, जिसमे मैं कॉलेज से आते ही धब्ब से बिस्तर पर पड़ के पंखे के नीचे अपने बाल खोल कर बालकनी से बाहर बादल देखा करती हूं। कमरा, जिसे मैंने अब तक अकेले जिया है।  हेलो? हां, मैं अभी ऑडिटोरियम में हूं, तुम कहां हो? मैं होस्टल में हूं। कमरे के बाहर। कितने देर से खड़ी हो? सुबह से ही आई हूं। ऑफिस का काम करा के ये लोग रूम अलॉट किए है।  अच्छा..... यार मैं तो 6 बजे तक आऊंगी। तुम उम्मम्म.... तुम्हारे साथ कोई और है? पापा थे चले गए वो। अच्छा, सामान भी है? हां, एक बैग है। अभी आना ...

एक कोशिश

आसमान के कोने से  झूलती हुई एक पहेली  पहेली जों एक गठरी की तरह है अपने आप में बहुत सारे छोर समेटे एक छोर की तलाश अक्सर दूसरे धागे खींच देती है और पहेली एक नए सिरे से दुबारा शुरू होती है धागे के कोने खींचता व्यक्ति थकता है पसीने में डूबता है रुकता भी है पर हर बार वो एक उत्साह से फिर  सबकुछ दुबारा शुरू करता है फिर वही हताशा और फिर वही उत्साह का सिलसिला जारी रहता है एक आस,की गठरी के धागे पुराने हो जाये एक सूरज की किरण, की एक हवा का झोंका आये ओर ये सारी गुत्थियां सुलझा दे जाये एक कोशिश, की एक सुबह सब ठीक हो जाएगा  सब कुछ अनवरत चलता रहता है।

टपकता खून

तुम्हारे पर्दे से टपकता खून  कभी तुम्हारा फर्श गंदा नहीं करता वो किनारे से लग के  बूंद बूंद रिसता है  मुझे मालूम है कि  हर गुनाहगार की तरह  तुम्हे, तुम्हारे गुनाह मालूम है पर तुम्हारा जिल्ल ए इलाही बन  सबकुछ रौंद जाना  दरवाजे पर लटके पर्दे पर  और खून उड़ेल देता है।