Skip to main content

Posts

अपने यादों से कहो

अपने यादों से कहो अपने सारे बिखरे- पड़े पल समेट के ले जाएं घर के कोनों में बिखरे कागजों कि तरह ये मुझसे जाने अनजाने चिपकती रहती है मै कभी इन्हें झटक के आगे बढ़ जाती हूं तो कभी इन्हें समेट के खूद को खो देती हूं मैं जितनी बार इन्हें बांधना चाहूं ये उतनी बार कोने से सरक के घर मे फैलती जाती हैं अपने यादों से कहो अपने सारे बिखरे-पड़े पल समेट के ले जाएं

मेरे निसांं

कल का निकला सूरज धीरे धीरे अस्त हो रहा है रंग जो भरा था मैंने सफेदी पे धीरे धीरे वो कोरा हो रहा है दिल कभी ना खत्म होने की आरजू रखता जरूर है ख्बाबों को फूलों सा महकाने कि चाहत रखता जरूर है पर अब ये आरजू, ये ख्वाब सब सिर्फ मेरे होगें उन्हें रंग देने कि चाहत और खवाहिश भी सिर्फ मेरी होगी मैली फर्श पे मैने कदम रखा जरूर है उसके धब्बे अपने पैरों में ले, अपनी गलियों में आ गई उन्हें फुरसत हो तो वो देखे मैने उनके दरवाजे पे अपना निसांं छोडा है

आँखें

आपको आँखें पढ़ना नही आता आता, तो न ये सवाल होते ना मेरे होठों पे जवाब के शब्द आपको तो शक्ल भी पढ़ना नही आता अगर आता, तो ना ये गलतफहमीयों का शिलशिला होता न मेरी आँखें सच बताने पे मजबूर होती सारी बातें अगर कह देनी हि थी तो वो हल्की मुस्कान, चमकीली आंखों ने मुझ धोखा दिया है मै न जाने क्या क्या पढ़ गई और आप चांद देख के भी बादलो मे खोने का ढोंग कर गये

किताब और फिल्म

हम इंसान जितना पढ़ के सिखते है, उससे कहीं अधिक देख के सिखते है । भारत हर साल सबसे ज्यादा फिल्में बनाने वाला देश है, जिसमे कुछ फिल्में किसी के जिवन पे आधारित होती है, तो कोई किताब पे। अगर कोई फिल्म किसी के जिवन पे बना है, तो लोगो को उनके जीवन के बारे मे या तो पहले से पता होता है, या कुछ लोगों को फिल्म देखने के बाद पता चलता है । ऐसे में ये जरूरी है कि फिल्म हूबहू वैसे हि दिखाया जाए, जैसे उनका जीवनकाल रहा है । ये शारी बाते किताबो पे बनी फिल्मों पे भी लागू होती है । क ई बार फिल्मकार हूबहू क्षण परदे पे उतार देते है, और क ई बार भारी चूक हो जाती है । ऐसे में फिल्मकारों को ये बात ध्यान में रखना चाहिए कि जो लोग पाठक होते है वो दर्शक भी होते है, ऐसे में एक ॒दो त्रुटि माफी के काबिल है, पर पुरी की पुरी  पलट पाठक बने दर्शक को पसंद नहीं आता। हाॅफ गर्लफ्रेंड, चेतन भगत द्वारा लिखी गई बेस्टसेलर किताब जिसपे फिल्म हाॅफ गर्लफ्रेंड बनाई गई । जब रिया, माधव को पारले जि दे के अपना शादी का बात बताती है, तो फिल्म मे इंडिया गेट पे चढने कि कोइ ज़रुरत हि नही थी । होटल मे माधव, रिया को पहले देखता है ...

सैलाब

मेरे अन्दर इतनी हिम्मत नहीं कि तुम्हारे जाने के बाद मै तुम्हारी हर ख्वाहिश पुरी कर सकु नाहीं इतनी ताकत बची है कि तुम्हारे बिखरे पड़े सामान को समेट सकू मै तो बस दरवाजे पर खडी इन बिखरी चीजो को निहार सकती हूँ क्यूंकि इनमें ही अब बसे हो तुम बाहर जाने की भी हिम्मत नहीं पता नहीं कब,कहाँ,कैसे कोई सैलाब आ जाये ।

घर

Listen to my latest performance on YourQuote app at https://www.yourquote.in/suruchi-kumari-fpjd/quotes/ghr-k1v97 तुमने जो यादें छोड़ दि थी मेरे पास युहि फटे हाल में जिसे तुमने  एक बार भी मुड़ के देखने की कोशिश तक न की वो पल जो तुमने जिये उन्हे छोड़ आये तुम मेरे दर पर या तुम्हारी जेब से सरक कर मेरे पास पहुँच ग ई वो सब मैने संभाल के लिफाफे में रख दिया है उन आँखों के दिये मे तुम हर रोज मुझे देखा करते थे वो दिपक बुझा आये तुम एक चांद कि याद मे भीनी-भीनी खुशबू जो मेरे घर में बिखेर के उसे रौंद आये तुम किसी की चाह मे वो घर मैने सजा लिया है । कभी गुजरो इन गलियों से तो अपना दिल लेते जाना पता नहीं तुम कैसे दिल लगाते फिरते हो ।

दुनिया रंग बिरंगा

न जाने कितने इमारत बने हैं कागजों पे न जाने कितने जिंदा लाशें सड़कों पे चल रहि है । चलिये उन सब से भी उनका हाल पूछ लेते हैं जो सालों से कब्रों मे कैद है न जाने कितने लोगों ने कितने जीवन उथल-पुथल कर दी है चलिए उन चंद लोगों को आज ढूंढ लेते है यू तो मगरूर इमारतें ताकतों का प्रदर्शन करती है कुछ चन्द गार मिट्टी से चलिए अपना आशियाँ बना लेते हैं ।